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पुरुरवा का प्रेम-प्रस्ताव :  उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूँ मैं 

पुरुरवा का प्रेम-प्रस्ताव :  उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूँ मैं
                
                                                         
                            ऋग्वेद में आयी वैदिक संस्कृति की पहली कथा उर्वशी और राजा पुरुरवा की कथा है। इसका काल विद्वानों ने 1600 ई.पू. माना है। दो भिन्न संस्कृतियों की टकहराट की प्रतीक बन गयी है यह मार्मिक प्रणय-गाथा। 
                                                                 
                            

उर्वशी स्वर्गलोक की मुख्य अप्सरा थी। वह देवों के राजा इन्द्र की कृपापात्र थी। वह उनके दरबार में प्रत्येक सन्ध्या नृत्य किया करती थी। वह सुन्दर थी। उसने अपना हृदय किसी को अर्पित नहीं किया था। उसे किसी ने भी बालिका, किशोरी अथवा माता के रूप में नहीं जाना था। उर्वशी सभी देवताओं की महिला मित्र के रूप में ही जानी-मानी जाती थी।

मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं

एक बार वह तथा उसकी सखी अन्य अप्सरा, चित्रलेखा दोनों भूलोक पर भ्रमण के लिए गयीं। वहाँ एक असुर की उन पर दृष्टि जा पड़ी और उसने उनका अपहरण कर लिया। 

वह उन्हें एक रथ में लिये चला जा रहा था और वे जोर-जोर से विलाप कर रही थीं कि भूलोक के एक राजा पुरुरवा ने उनका चीत्कार सुन लिया। पुरुरवा सिंह के समान निर्भीक था। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के असुर पर आक्रमण कर दिया। अन्ततः उसने असुर को तलवार के घाट उतार दिया।

पुरुरवा और उर्वसी के बीच पनप रहे प्रेम के बीच निम्नलिखित पंक्तियां पुरुरवा के द्वारा कही गयीं हैं-


मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं,
उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूँ मैं
अंध तम के भाल पर पावक जलाता हूँ,
बादलों के सीस पर स्यंदन चलाता हूँ
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मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं

4 वर्ष पहले

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