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जैसा दर्द हो वैसा मंज़र होता हैः दार्शनिकता के शानदार 21 शेर

top 21 sher on Philosophy
                
                                                         
                            जैसा दर्द हो वैसा मंज़र होता है,
                                                                 
                            
मौसम तो इंसान के अंदर होता है। 
अज़ीज़ ऐजाज़ 

अज़ल तो मुफ़्त में बदनाम है ज़माने में,
कुछ उनसे पूछ, जिन्हें ज़िंदगी ने मारा है। 
फ़ैज़ 

उस शख़्स के ग़म का कोई अंदाज़ा लगाए,
जिसको कभी रोते हुए देखा न किसी ने।
वकील अख़्तर 

तिरे चराग़ अलग हों, मिरे चराग़ अलग,
मगर उजाला तो फिर भी जुदा नहीं होता। 
वसीम बरेलवी 

न किसी की आंख का नूर हूं, न किसी के दिल का क़रार हूं,
जो किसी के काम न आ सके, मैं वो एक मुश्ते गुब़ार हूं। 
ज़फ़र 

मैं अकेला ही चला था जानिबे-मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया। 
मजरूह सुल्तानपुरी 

रगों में दौड़ने-फ़िरने के हम नहीं कायल,
जो आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है। 
ग़ालिब 

हर चीज़ का खोना भी बड़ी दौलत है,
बेफिक्री से सोना भी बड़ी दौलत है। 
अमजद हैदराबादी 

मिट्टी का जिस्म ले के चले हो तो सोच लो,
इस रास्ते में एक समंदर भी आएगा। 
सलीम शाहिद 

ऐसी तारीकियां आंखों में बसी हैं कि 'फ़राज़'
रात तो रात है हम दिन को जलाते हैं चराग़। 
अहमद फ़राज़

लम्हों के अज़ाब सह रहा हूं
मैं अपने वजूद की सज़ा हूं। 
अतहर नफ़ीस  

इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई
हम न सोए रात थक कर सो गई।
 राही मासूम रज़ा

कभी मेरी तलब कच्चे घड़े पर पार उतरती है
कभी महफ़ूज़ कश्ती में सफ़र करने से डरता हूं।
 फ़रीद परबती  

न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं
अजब सफ़र है कि बस हम-सफ़र को देखते हैं। 
अहमद फ़राज़

जहां चोट खाना, वहीं मुस्कुराना,
मगर इस अदा से कि रो दे जमाना। 
वामिक जौनपुरी 

शोर यूं ही न परिंदों ने मचाया होगा,
कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा। 
अज्ञात 

मेरी मुट्ठी में सुलगती रेत रख कर चल दिया,
कितनी आवाज़ें दिया करता था ये दरिया मुझे। 
अज्ञात 

उसकी फ़ितरत में नहीं, रुक के कोई बात सुने,
वक्त आवाज़ है, आवाज़ को आवाज़ न दो। 
अज्ञात 

दफ़नाना देखभाल के हसरत भरे की लाश,
लिपटी हुई कफ़न में कोई आरज़ू न हो। 
अज्ञात 

हुस्न और इश्क़ के नैरंग खुदा ही जाने,
शमअ जलती है कि दिल जलता है परवाने का। 
साकिब लखनवी 

इससे बढ़कर दोस्त कोई दूसरा होता नहीं,
सब जुदा हो जाएं, लेकिन ग़म जुदा होता न‌हीं। 
जिगर मुरादाबादी 
 
9 वर्ष पहले

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