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जानें अपनी बात कहने के लिए नेताओं को कब-कब लेना पड़ा काव्य का सहारा

Shayari in politics
                
                                                         
                            

चुनाव प्रचार थमने के बाद और आख़िरी चरण की वोटिंग पूरी होने के बाद पूरे देश की नज़रें इस वक़्त चुनाव-परिणामों पर टिकी हुई हैं। देश के नेताओं ने प्रचार के दौरान विपक्ष पर जमकर हमले किए और जनता से तमाम वादे किए। कई बार ऐसे मौके भी आए जब उन्हें अपनी बात को कहने के लिए काव्य का सहारा लेना पड़ा। यानी कि उन्होंने कविता या शेर के ज़रिए अपनी बात लोगों के सामने रखी। जानें कब-कब थे ऐसे मौके 

चुनाव प्रचार के दौरान प्रियंका गांधी ने 'दिनकर' की इस कविता को पढ़ा था

मैत्री की राह बताने को
सबको सुमार्ग पर लाने को
दुर्योधन को समझाने को
भीषण विध्वंस बचाने को
भगवान् हस्तिनापुर आये
पांडव का संदेशा लाये

दो न्याय अगर तो आधा दो
पर, इसमें भी यदि बाधा हो
तो दे दो केवल पाँच ग्राम
रक्खो अपनी धरती तमाम
हम वहीं खुशी से खायेंगे
परिजन पर असि न उठायेंगे

दुर्योधन वह भी दे ना सका
आशीष समाज की ले न सका
उलटे, हरि को बाँधने चला
जो था असाध्य, साधने चला
(जब नाश मनुज पर छाता है
पहले विवेक मर जाता है) - इस पंक्ति को प्रियंका ने पढ़ा था 

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7 वर्ष पहले

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