जैसे जून-जुलाई के महीने में बारिश दिल को ख़ुश कर देती है और उसके बाद तुरंत निकली धूप दिल को बेहद उदास। उसी तरह के ज़हन के साथ शायरों ने भी कुछ अल्फ़ाज़ कहे हैं। जब शायर बेहद उदास हुए तो उन्होंने कुछ ऐसा कहा
मैं दिन हूं मेरी ज़बीं पर दुखों का सूरज है
दिये तो रात की पलकों पे झिलमिलाते हैं
- बशीर बद्र
ये दोस्ती ये मरासिम ये चाहतें ये ख़ुलूस
कभी कभी मुझे सब कुछ अजीब लगता है
- जाँ निसार अख़्तर
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