वो लोग बहुत ख़ुशक़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आकर हम ने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी का सफ़रनामा लंबा है। फ़ैज़ सिर्फ मोहब्बतों के शायर नहीं थे, इसीलिए वे कहते हैं -
'और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।'
फ़ैज़ के यहां इश्क़ है तो क्रांति भी है, असहमतियां भी हैं। उनकी शायरी में गरीबों-मज़लूमों की आवाज़ है जो आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था में कहीं दब गई है। उनके शायरी के कई मुकाम हैं। किसी समय वे बहुत रूमानी अंदाज़ में सामने आते हैं और उस रूप में भी उनका अंदाज़ अलहदा है -
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के
वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं
तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के
इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन
देखे हैं हम ने हौसले पर्वरदिगार के
शेर लिखने की यह शैली ही फ़ैज़ को औरों से अलग करती है। दुनिया सिर्फ प्रेम तक सीमित नहीं है, इसीलिए फ़ैज़ भी उन सीमाओं को लांघ जाते हैं, इंसानियत के हर पहलुओं को अपने शायरी में शामिल करते हैं। प्रेम से अलग भी उन सभी जरूरतों पर फ़ैज सोचते हैं, लिखते हैं -
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझसे भी दिलफरेब हैं, ग़म रोजगार के।
फ़ैज़ के यहां क्रांति और रोमांटिसिज्म का मिलाजुला रूप देखने को मिलेगा। हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार और आलोचक डॉ. विजय मोहन सिंह लिखते हैं कि ''फ़ैज़ अपने समकालीन और घनिष्ठ लैटिन अमेरिकन कवि पाब्लो नेरूदा के निकट नजर आते हैं, जो अपने 'ट्वेंटी लव पोएम्स' के दायरे से बाहर निकलकर किसानों और मजदूरों के कवि कहलाए। प्रेम की दुनिया से निकलकर 'दुनिया के कवि' के रूप में प्रतिष्ठित हुए।'' फ़ैज़ के यहाँ भी आपको यही मिलेगा। फ़ैज़ शायरी की परम्परागत हदबंदियों से बाहर निकलते हैं, अपनी रचनात्मकता में राजनीतिक सरहदों के आर-पार बेख़ौफ़ आवाजाही करने लगते हैं, और तब वे अवाम के शायर हो जाते हैं-
बोल, कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल, ज़बां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल, कि जाँ अब तक तेरी है
देख कि आहन-गर की दुकां में
तुन्द हैं शोले, सुर्ख हैं आहन
खुलने लगे कुफ्लों के दहाने
फैला हर इक ज़ंजीर का दामन
बोल, कि थोड़ा वक्त बहुत है
ज़िस्मों ज़ुबां की मौत से पहले
बोल, कि सच ज़िन्दा है अब तक
बोल, जो कुछ कहना है कह ले
फ़ैज़ की यही बेबाकी उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करती है। लेकिन उनके वतन पाकिस्तान में इस बेबाकी के लिये जगह नहीं थी, नतीजतन उन्हें जेल भी जाना पड़ा, निर्वासन भी झेलना पड़ा। जेल की पीड़ा या निर्वासन का दंश फ़ैज़ को तोड़ता नहीं, बल्कि इसके बाद वे अपनी अभिव्यक्तियों में और मुखर होते गए, उनकी शायरी और पकती गई। प्रगतिशील मूल्यों और वामपंथी विचारों के बतौर शेरो- शायरी की दुनिया में दाख़िल होने वाले फ़ैज़ लम्बे समय तक अंतर्राष्ट्रीय प्रगतिशील पत्रिका 'लोटस' से जुड़े रहे।
न गुल खिले हैं न उन से मिले न मय पी है
अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है
13 फरवरी 1911 को आधुनिक पाकिस्तान के सियालकोट शहर में पैदा हुए फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ अपने इंकलाबी रचनाओं में रसिक भाव के मेल की वजह से जाने जाते हैं। उर्दू, अरबी और फारसी में शिक्षा ग्रहण करने के बाद 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े।
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आप की याद आती रही रात भर
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