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दिनकर की सुनहरी यादें और रश्मिरथी की ये 20 मुख्य पंक्तियां...

कर्ण
                
                                                         
                            रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को हुआ था। उनका निधन 24 अप्रैल 1974 को हुआ था। रामधारी सिंह दिनकर ने कर्ण पर रश्मिरथी खंडकाव्य की रचना की। इसमें सात सर्गों में कर्ण के जीवन का काव्यात्मक चित्रण किया गया है। उसकी कुछ ओजस्वी और प्रेरणास्पद पंक्तियां हम यहां पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। कर्ण के जीवन के बारे में अमूमन हर लोग वाकिफ हैं। इन पंक्तियों से आप कर्ण के जीवन को और समझ सकेंगे।   
                                                                 
                            


प्रेमयज्ञ अति कठिन कुण्ड में कौन वीर बलि देगा ?
तन, मन, धन, सर्वस्व होम कर अतुलनीय यश लेगा ?
हरि के सन्मुख भी न हार जिसकी निष्ठा ने मानी,
धन्य-धन्य राधेय ! बन्धुता के अद्भुत अभिमानी।

पर जाने क्यों नियम एक अद्भुत जग में चलता है,
भोगी सुख भोगता, तपस्वी और अधिक जलता है।
हरिआली है जहाँ, जलद भी उसी खण्ड के वासी,
मरु की भूमि मगर। रह जाती है प्यासी की प्यासी।

प्रतिज्ञा

और, वीर जो किसी प्रतिज्ञा पर आकर अड़ता है,
सचमुच, उसके लिए उसे सब-कुछ देना पड़ता है
नहीं सदा भीषिका दौड़ती द्वार पाप का पाकर,
दु:ख भोगता कभी पुण्य को भी मनुष्य अपनाकर।

पर, तब भी रेखा प्रकाश की जहाँ कहीं हँसती है,
वहाँ किसी प्रज्वलित वीर नर की आभा बसती है;
जिसने छोड़ी नहीं लीक विपदाओं से घबराकर।
दी जग को रोशनी टेक पर अपनी जान गँवाकर।
 
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प्रतिज्ञा

8 वर्ष पहले

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