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रघुवीर सहाय ने तीर कमान पर लिया और कहा 'नेता क्षमा करें'

Raghuvir Sahay hindi kavita neta kshama karein
                
                                                         
                            

रघुवीर सहाय ग़ुलाम भारत में पैदा हुए उन विरले कवियों में से एक हैं जिन्होंने जंज़ीरों में जकड़न से लेकर स्वतंत्रता तक की यात्रा के जिन पहलूओं को देखा उसी सच्चाई के साथ उस लिख भी दिया। रघुवीर ने जब होश संभाला होगा तब देश स्वतंत्र हुआ होगा। उसी देश, काल और वातावरण का वास्तविक असर उनकी काव्य- रचना पर भी पड़ा है।

उनकी कविताओं में उनके ज़हन का पुट नज़र आता है। सीधा प्रहार करते हुए वह अपनी दिली बातें रख देते हैं और संकोच नहीं करते। इससे रघुवीर का काव्य और भी विशिष्ट हो जाता है। उनकी एक कविता है ‘नेता क्षमा करें’

‘नेता क्षमा करें’

लोगों मेरे देश के लोगों और उनके नेताओं
मैं सिर्फ़ एक कवि हूं

मैं तुम्हें रोटी नहीं दे सकता न उसके साथ खाने के लिए ग़म
न मैं मिटा सकता हूँ ईश्वर के विषय में तुम्हारा सम्भ्रम

लोगों में श्रेष्ठ लोगो मुझे माफ़ करो,
मैं तुम्हारे साथ आ नहीं सकता।
यानी कि आप ही सोचें कि जो कवि नहीं हैं
कि लोग सब एक तरफ़ और मैं एक तरफ़
और मैं कहूँ कि तुम सब मेरे हो
पूछिए, कौन हूँ मैं ?

मैंने कोशिश की थी कि कुछ कहूँ उनसे
लेकिन जब कहा तुमको प्यार करता हूँ
मेरे शब्द एक लहरिया दोगाना बन
उकडू बैठे लोगों पर भिनभिनाने लगे

फिर कुछ लोग उठे बोले कि आइए तोड़ें पुरानी-फ़िलहाल-मूर्तियाँ
साथ न दो हाथ ही दो सिर्फ उठा

झोले में बन्द कर एक नयी मूर्ति मुझे दे गये

यानी कि आप ही देखें कि जो कवि नहीं हैं
अपनी एक मूर्ति बनाता हूँ और ढहाता हूँ
और आप कहते हैं कि कविता की है
क्या मुझे दूसरों को तोड़ने की फुरसत है ?

 

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‘नेता क्षमा करें’

7 वर्ष पहले

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