क़त्ल, क़ातिल जैसे शब्द शायरी में हिंसा और प्रेम दोनों अर्थों में प्रयोग में लाये गये हैं। अलग शेर अपने पाठ में ही अर्थों की तरफ इशारा कर देते हैं। पेश है क़त्ल शायरी-
की मिरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना
~मिर्ज़ा ग़ालिब
क़त्ल तो नहीं बदला क़त्ल की अदा बदली
तीर की जगह क़ातिल साज़ उठाए बैठा है
~कैफ़ भोपाली
दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो
~कलीम आजिज़
वो मेरे क़त्ल का मुल्ज़िम है लोग कहते हैं
वो छुट सके तो मुझे भी गवाह लिख लीजे
~बेकल उत्साही
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