संजय लीला भंसाली की चर्चित फिल्म 'पद्मावत' में तूती-ए-हिंद अमीर खुसरों को भी पेश किया गया है। फिल्म में खुसरो को समय-समय पर खिलजी के दरबार में शेर और शायरी करते हुए दिखाया गया है। इस फिल्म में खुसरो हालांकि खिलजी के महिमामंडन में व्यस्त रहे लेकिन इतिहास में दर्ज उनके दोहे काफी प्रसिद्ध रहे हैं।
अलाउद्दीन खिलजी ने 17 जुलाई, 1296 ई. को अपने आपको सुल्तान घोषित किया था। उनका 12 अक्टूबर, 1296 ई. को राज्याभिषेक हुआ था। अलाउद्दीन खिलजी ने अमीर खुसरो की सहायता से राजस्व सम्बन्धी सिद्धान्त भी तय किए थे। खुसरों ने खिलजी को विश्व का सुल्तान, पृथ्वी के शासकों का सुल्तान, युग का विजेता तथा जनता का चरवाहा था।
जब छवि देखी पीहू की तो अपनी भूल गई...
खुसरो को खिलजी के दरबार में खुसरु-ए-शायरा के खिताब से नवाजा गया था। रानी पद्मिनी को हासिल करने में अलाउद्दीन खिलजी की सोच बदलने की खुसरो ने कोशिश की थी। खुसरो ने कहा था कि स्त्री हृदय पर शासन स्नेह से ही किया जा सकता है, वह सच्ची राजपूतानी जान दे देगी और आप उसे हासिल नहीं कर सकेंगे। काव्य चर्चा में हम अपने पाठकों के लिए खुसरों की कुछ प्रमुख नज्में पेश कर रहे हैं।
अपनी छवि बनाई के जो मैं पी के पास गई,
जब छवि देखी पीहू की तो अपनी भूल गई।
छाप तिलक सब छीन्हीं रे मोसे नैंना मिलाई के,
बात अघम कह दीन्हीं रे मोसे नैंना मिला के।
बल बल जाऊँ मैं तोरे रंग रिजना
अपनी सी रंग दीन्हीं रे मोसे नैंना मिला के।
प्रेम वटी का मदवा पिलाय के मतवारी कर दीन्हीं रे
मोसे नैंना मिलाई के।
गोरी गोरी बईयाँ हरी हरी चूरियाँ
बइयाँ पकर हर लीन्हीं रे मोसे नैंना मिलाई के।
खुसरो निजाम के बल-बल जइए
मोहे सुहागन किन्हीं रे मोसे नैंना मिलाई के।
ऐ री सखी मैं तोसे कहूँ, मैं तोसे कहूँ, छाप तिलक....।
तन मेरो मन पियो को, दोउ भए एक रंग...
खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग।
तन मेरो मन पियो को, दोउ भए एक रंग।।
खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार।
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।
खीर पकायी जतन से, चरखा दिया जला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।
गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस।
चल खुसरो घर आपने, सांझ भयी चहु देस।।
खुसरो मौला के रुठते, पीर के सरने जाय।
कहे खुसरो पीर के रुठते, मौला नहिं होत सहाय।।
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके
प्रेम भटी का मदवा पिलाइके
मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ
बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
बल बल जाऊं मैं तोरे रंग रजव
अपनी सी रंग दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
ख़ुसरो निजाम के बल बल जाए
मोहे सुहागन कीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके॥
आ साजन मोरे नयनन में, सो पलक ढाप तोहे दूँ।
न मैं देखूँ औरन को, न तोहे देखन दूँ।
अपनी छवि बनाई के जो मैं पी के पास गई।
जब छवि देखी पीहू की तो अपनी भूल गई।।
खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय।
वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय।।
संतों की निंदा करे, रखे पर नारी से हेत।
वे नर ऐसे जाऐंगे, जैसे रणरेही का खेत।।
खुसरो सरीर सराय है क्यों सोवे सुख चैन।
कूच नगारा सांस का, बाजत है दिन रैन।।
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जब छवि देखी पीहू की तो अपनी भूल गई...
8 वर्ष पहले
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