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चीजों के गिरने के नियम होते हैं मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होते: नरेश सक्सेना 

चीजों के गिरने के नियम होते हैं मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होते: नरेश सक्सेना
                
                                                         
                            नरेश सक्सेना हमारे समय के जितने अच्छे, उतने ही लोकप्रिय कवि भी हैं। वे अपनी अनुभूतियों, संवेदनाओं और सृजन की मौलिकता, गुणवत्ता व वस्तुनिष्ठता को लेकर वे सतर्क रहने वाले कवि हैं। उनके कुल मिलाकर दो कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं- पहला: ‘समुद्र पर हो रही बारिश’ और दूसरा: 'सुनो चारुशीला'। अलबत्ता, ये दोनों ही बहुचर्चित रहे हैं और उनकी चुनी हुई कविताओं का एक संग्रह ‘नरेश सक्सेना और उनकी चुनिंदा कविताएं’ नाम से भी छपा है। पेश है उनकी कविता- गिरना....  
                                                                 
                            

चीजों के गिरने के नियम होते हैं मनुष्यों के गिरने के
कोई नियम नहीं होते
लेकिन चीजें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं
अपने गिरने के बारे में
मनुष्य कर सकते हैं

बचपन से ऐसी नसीहतें मिलती रहीं
कि गिरना हो तो घर में गिरो
बाहर मत गिरो
यानी चिट्ठी में गिरो
लिफाफे में बचे रहो, यानी
आँखों में गिरो
चश्मे में बचे रहो, यानी
शब्दों में बचे रहो
अर्थों में गिरो
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6 वर्ष पहले

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