ज़िंदगी हमेशा इम्तहान लेती रहती है। जीवन के हर मोड़ पर आपको एक से अधिक रास्तों दिखते तो ज़रूर हैं लेकिन हर रास्ता मंज़िल की तरफ तो जाता नहीं । एक ऐसा समय आता है जब आपको यह निर्णय लेना पड़ता है कि रास्ते का चुनाव किस प्रकार किया जाए। लेकिन उसी समय में आपकी नैतिकता, साहस और विश्वास काम आता है। शेरों-शायरी की श्रृंखला में आज हम आपके लिए ऐसे ही आंखें खोल देने वाले शेर लाए हैं-
जहां चोट खाना, वहीं मुस्कुराना
मगर इस अदा से कि रो दे ज़माना
-वामिक जौनपुरी
बरसात में तालाब तो हो जाते हैं कमज़र्फ़
बाहर कभी आपे से समुंदर नहीं होता
-ऐजाज़ रहमानी
जनाज़ा कहता जाता है बराबर कांधे वालों से
मेरे पीछे चले आओ, तुम्हारा रहनुमा हूं मैं
-बेदिल
उस शख़्स के ग़म का कोई अंदाज़ा लगाये
जिसको कभी रोते हुए देखा न किसी ने
-वकील अख़्तर
इक चीज़ थी ज़मीर जो वापस न ला सका
लौटा तो है ज़रूर वो दुनिया ख़रीदकर
-क़मर इकबाल
ये दुनिया है यहां कोई जगह ख़ाली नहीं रहती
किसी के आने-जाने से कभी कुछ कम नहीं होता
-बशीर बद्र
तिरे चराग़ अलग हों, मिरे चराग़ अलग
मगर उजाला तो फिर भी जुदा नहीं होता
-वसीम बरेलवी
मिट्टी का जिस्म ले के चले हो तो सोच लो
इस रास्ते में एक समुंदर भी आएगा
- सलीम शाहिद
मेरी मुट्ठी में रेत रख कर चल दिया
कितनी आवाज़ें दिया करता था ये दरिया मुझे
-अज्ञात
उसकी फ़ितरत में नहीं, रुक के कोई बात सुने
वक़्त आवाज़ है, आवाज़ को आवाज़ न दो
-अज्ञात
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया मसंदर से मिला, दरिया नहीं रहता
-अज्ञात
गुनहगारों में शामिल हैं, गुनहगारों से नहीं वाक़िफ़
सज़ा को जानते हैं हम, ख़ुदा जाने ख़ता क्या है
-चकबस्त
कोई समझे तो एक बात कहूं
इश्क़ तौफ़ीक़ है, गुनाह नहीं
-फ़िराक़ गोरखपुरी
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6 वर्ष पहले
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