मोहम्मद रफ़ी और उनकी आवाज़ किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं, उन्होंने हिन्दी सिनेमा के कई गीतों को अपनी आवाज़ की रेशम के बांधा है इससे कई गीतकारों के बोलों को सुरों से संवरने का मौका मिला साथ ही रफ़ी साहब ने कई ग़ज़लकारों के कलामों को भी गाया है।
पेश हैं वह शायर और उनके कलाम जिन्हें रफ़ी साहब ने अपनी आवाज़ दी है।
मिर्ज़ा ग़ालिब
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना
गिर्या चाहे है ख़राबी मेरे काशाने की
दर ओ दीवार से टपके है बयाबाँ होना
वा-ए-दीवानगी-ए-शौक़ कि हर दम मुझ को
आप जाना उधर और आप ही हैराँ होना
जल्वा अज़-बस-कि तक़ाज़ा-ए-निगह करता है
जौहर-ए-आइना भी चाहे है मिज़्गाँ होना
इशरत-ए-क़त्ल-गह-ए-अहल-ए-तमन्ना मत पूछ
ईद-ए-नज़्ज़ारा है शमशीर का उर्यां होना
ले गए ख़ाक में हम दाग़-ए-तमन्ना-ए-नशात
तू हो और आप ब-सद-रंग-ए-गुलिस्ताँ होना
इशरत-ए-पारा-ए-दिल ज़ख़्म-ए-तमन्ना खाना
लज़्ज़त-ए-रीश-ए-जिगर ग़र्क़-ए-नमक-दाँ होना
कि मेरे क़त्ल के बा'द उस ने जफ़ा से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशेमाँ होना
हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत 'ग़ालिब'
जिस की क़िस्मत में हो आशिक़ का गरेबाँ होना
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे एतिबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया
हँसा हँसा के शब-ए-वस्ल अश्क-बार किया
तसल्लियाँ मुझे दे दे के बेक़रार किया
हम ऐसे महव-ए-नज़ारा न थे जो होश आता
मगर तुम्हारे तग़ाफ़ुल ने होशियार किया
फ़साना-ए-शब-ए-ग़म उनको इक कहानी थी
कुछ एतबार किया कुछ न एतबार किया
सुना है तेग़ को क़ातिल ने आब-दार किया
अगर ये सच है तो बे-शुबह हम पे वार किया
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दाग़ देहलवी
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