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इश्क़ का रोग और शायरों के अल्फ़ाज

काव्य चर्चा

इश्क़ का रोग और शायरों के अल्फ़ाज...

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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नये-नये प्रेम में भूख -प्यास नहीं लगती, दिल बेचैन रहता है और कहीं मन भी नहीं लगता। इश्क़ में डूबे व्यक्ति का हाल कुछ ऐसा हो जाता है, जिसे वो छुपा भी नहीं पाता और किसी को बता भी नहीं पाता। इश्क़ में इंसान अपना दिल ही नहीं बल्कि अपना दिमाग भी हार बैठता है।  मनोवैज्ञानिकों ने प्यार के लिए इंसान के दिमाग को भी दिल जितना ही कुसूरवार ठहराया है, लेकिन शायरों ने कहीं दीवानगी की हद तक इस रोग सुखद बताया तो कहीं रोग। पेश है 'प्रेम रोग' पर शायरों के अल्फ़ाज़- 

इश्क़ का रोग भला कैसे पलेगा मुझ से 
क़त्ल होता ही नहीं यार अना का मुझ से 
~प्रखर मालवीय कान्हा

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब' 
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने 
~मिर्ज़ा ग़ालिब आगे पढ़ें

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