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सबको लड़ने पड़े अपने-अपने युद्ध, चाहे राजा राम हों या हों गौतम बुद्ध...

कुमार विश्वास
                
                                                         
                            सियासत! मैं तेरा खोया या पाया हो नहीं सकता
                                                                 
                            
तेरी शर्तों पे ग़ायब या नुमाया हो नहीं सकता
भले साज़िश से गहरे दफ़्न मुझ को कर भी दो पर मैं
सृजन का बीज हूँ मिट्टी में ज़ाया हो नहीं सकता...


कुमार विश्वास ने साहित्य के जरिए अपना ओज देकर सियासत को संघर्ष का नया कलेवर दिया । राष्ट्र हित, चरित्र, आचार-विचार और आपसी प्रेम के वैश्विक सद्भाव को सियासत का मूल आधार मानने वाले कुमार ने पूरे देश में साहित्‍य और राजनीति में एक नया तारतम्य स्‍थापित करने का अतुलनीय प्रयास किया है।  लेकिन आज कुमार विश्वास को आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा के लिए पार्टी से उम्मीदवार नहीं बनाया है। 

'कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है' जैसी एकांगी विरह की भाव रसमयी के साथ चर्चित होने वाले कुमार विश्वास को 2011 के अन्ना आंदोलन के दौरान जनता के साथ प्रत्यक्ष जुड़ने का मौका मिला। इसके बाद कुमार की आवाज में साहित्य और राजनीति से सृजन की वह हुंकार आज भी जारी है। 

कुमार लिखते हैं कि- 

'उठा पलकों को जिसने दिन उगाया था फलक पर,
उसी की जुल्फ का रातों पे साया हो गया है...
नजर का एक टुकड़ा छत पर फेंका है किसी ने
जिसे पढ़ने में पूरा चांद जाया हो गया है'...
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दिल है गर तू तो दिल का मैं एहसास हूं

8 वर्ष पहले

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