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किस डे-अधरों पर संपूर्ण समर्पण, महकते शेरों के साथ

किस डे
                
                                                         
                            
चुंबन एक ऐसी अंतर्विरोधी प्रक्रिया है जो एक तरफ़ तो दिल में उठे ज्वार को शांत करती है और दूसरी तरफ़ स्पंदन उत्पन्न करती है। यह दो प्रेमी देहों का वो समास है जिसमें शरीर के माध्यम से आत्मा को गिरह लगाई जाती है। एक मां का माथे पर दिया बोसा आशीर्वाद का सबसे गहन स्वरूप है तो एक प्रेमी का अधरों पर दिया चुंबन प्रीति की परिणति है। शायरों की कलम ने भी कागज़ पर चुंबन की ख़ूबसूरत कहानियां लयबद्ध की हैं।  

एक बोसा होंट पर फैला तबस्सुम बन गया
जो हरारत थी मिरी उस के बदन में आ गई
- काविश बद्री

क्या क़यामत है कि आरिज़ उन के नीले पड़ गए
हम ने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का
- अज्ञात

चलो जाने दो बेताबी में ऐसा हो ही जाता है...

न हो बरहम जो बोसा बे-इजाज़त ले लिया मैं ने
चलो जाने दो बेताबी में ऐसा हो ही जाता है
- जलाल लखनवी

बे-ख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआफ़
ये दिल-ए-बेताब की सारी ख़ता थी मैं न था
- बहादुर शाह ज़फ़र

बोसा आँखों का जो माँगा तो वो हँस कर बोले
देख लो दूर से खाने के ये बादाम नहीं
- अमानत लखनवी
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चलो जाने दो बेताबी में ऐसा हो ही जाता है...

8 वर्ष पहले

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