भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे -तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी न जाना।
कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है।
कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
यहाँ पैरवी अब दलाली है बेटे।
कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटे
यही जिन्दगी उनको देती है बेटे
खुले आम कातिल यहाँ घूमते हैं
सिपाही दरोगा चरण चुमतें है।
लोककवि कैलाश गौतम अपनी किस्म के एकदम अनोखे कवि थे। लोकभाषा में रचे उनके गीतों-कविताओं में रस, अनुपम छंद, संवेदनाएं, मनोरंजन और लोकजीवन की उपस्थिति मिलेगी। उनके गीत आंचलिक बिम्बों से पटे पड़े हैं। ग्रामीण जीवन शैली की उठापटक को उन्होंने अपने कविताओं और गीतों बखूबी दिखाया। गांव गया था, गांव से भागा’, ’अमवसा क मेला’, ’सब जैसा का तैसा’, ’गान्ही जी’ और ‘कचहरी न जाना’ जैसी उनकी कविताएं और गीत लोकप्रियता का पैमाना बन गए थे। ‘बाबू आन्हर माई आन्हर’ जैसे गीत कबीरी परम्परा के बिना नहीं आ सकते थे। बीसवीं सदी के आधुनिक हिंदी गीति-काव्य का अगर कोई ठेठ पूर्वी घराना है तो कैलाश गौतम उसके प्रतिनिधि कवि और गीतकार हैं। ग्रामीण और कस्बाई जीवन में मेले का बहुत महत्व होता और लोकजीवन में ऐसे उत्सवों को लेकर किस तरह उत्साह बना रहता है, उसे कैलाशजी अपनी कविता में बखूबी ढाल देते हैं।
इलाहबाद में हर साल लगने वाले कुम्भ मेले को जब उन्होंने अपने कविता का विषय बनाया तो उसके पीछे के कारणों के बारे में कहते थे, ''विश्व का सबसे बड़ा मेला इलाहबाद में लगता है। कभी कुम्भ के रूप में कभी अर्धकुम्भ के रूप में, मैंने बचपन से अपने दादा-दादी को, माता-पिता को मेले में आने की तैयारी करते हुए देखा है। रेडियो इलाहबाद में होने के कारण पिछले कई साल से मैं भी इस मेले का हिस्सा रहा। चूँकि अमावस्या के पावन पर्व पर सबसे अधिक भीड़ लगती है इसलिए मैंने कविता का शीर्षक भी "अमौसा क मेला" रखा। हर बड़े मेले में भीड़ का चेहरा एक सा होता है। कई बार इस भीड़ के चलते दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं। चाहे वो नासिक का कुम्भ रहा हो या हरिद्वार का, 1954 से बहुत लोग मरे, पर मैंने इस कविता में छोटी-बड़ी घटनाओं को पकड़ा, जहां जिंदगी है मौत नहीं है, हंसी है दुख नहीं है।
भक्ति के रंग में रँगल गाँव देखा,
धरम में, करम में, सनल गाँव देखा।
अगल में, बगल में सगल गाँव देखा,
अमौसा नहाये चलल गाँव देखा।
एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा,
कान्ही पर बोरा, कपारे पर बोरा।
कमरी में केहू, कथरी में केहू,
रजाई में केहू, दुलाई में केहू।
आजी रँगावत रही गोड़ देखा
हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखा।
घुँघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया,
गठरिया में अब का रखाई बतईहा।
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कविताओं में लोगों की ज़िंदगी दिखती है
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