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वे बड़े शायर जिन्होंने अपनी ये नज़्में औरतों के नाम कर दीं

International womens day 2019 Famous shayar nazm on women
                
                                                         
                            

महिलाओं को समाज में हमेशा से रूढ़ियों का सामना करना पड़ा है, सारी वर्जनाएं उसी के लिए बना दी गयीं। उसे कमज़ोर माना गया इसलिए उस पर सदा से अधिकार करने की कोशिश भी गयी। इस बात को समाज के उदारवादी विचारधारा वाले लेखकों ने समझा और इस मानसिक जंज़ीर को तोड़ने की कोशिश की। उन्होंने अपनी कविताओं, कहानियों के माध्यम से समाज में क्रान्ति लाने की कोशिश की।

मजाज़ ने महिलाओं को दुपट्टे से परचम बनाने की सलाह दी 

हिजाब-ए-फ़ित्ना-परवर अब उठा लेती तो अच्छा था
ख़ुद अपने हुस्न को पर्दा बना लेती तो अच्छा था

तेरी नीची नज़र ख़ुद तेरी इस्मत की मुहाफ़िज़ है
तू इस नश्तर की तेज़ी आज़मा लेती तो अच्छा था
तेरी चीन-ए-जबीं ख़ुद इक सज़ा क़ानून-ए-फ़ितरत में
इसी शमशीर से कार-ए-सज़ा लेती तो अच्छा था
ये तेरा ज़र्द रुख़ ये ख़ुश्क लब ये वहम ये वहशत
तू अपने सर से ये बादल हटा लेती तो अच्छा था
दिल-ए-मजरूह को मजरूह-तर करने से क्या हासिल
तू आँसू पोंछ कर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था
तेरे ज़ेर-ए-नगीं घर हो महल हो क़स्र हो कुछ हो
मैं ये कहता हूँ तू अर्ज़-ओ-समा लेती तो अच्छा था
अगर ख़ल्वत में तू ने सर उठाया भी तो क्या हासिल
भरी महफ़िल में आकर सर झुका लेती तो अच्छा था
तेरे माथे का टीका मर्द की क़िस्मत का तारा है
अगर तू साज़-ए-बेदारी उठा लेती तो अच्छा था
अयाँ हैं दुश्मनों के ख़ंजरों पर ख़ून के धब्बे
उन्हें तू रंग-ए-आरिज़ से मिला लेती तो अच्छा था
सनानें खींच ली हैं सर-फिरे बाग़ी जवानों ने
तू सामान-ए-जराहत अब उठा लेती तो अच्छा था
तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था

 

साहिर ने समाज में औरतों की स्थिति को व्यक्त किया

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया
तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में
नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में

ये वो बे-इज़्ज़त चीज़ है जो बट जाती है इज़्ज़त-दारों में
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
मर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवा औरत के लिए रोना भी ख़ता
मर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ा

मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जिन सीनों ने इन को दूध दिया उन सीनों को बेवपार किया
जिस कोख में इन का जिस्म ढला उस कोख का कारोबार किया
जिस तन से उगे कोंपल बन कर उस तन को ज़लील-ओ-ख़्वार किया

संसार की हर इक बे-शर्मी ग़ुर्बत की गोद में पलती है
चकलों ही में आ कर रुकती है फ़ाक़ों से जो राह निकलती है
मर्दों की हवस है जो अक्सर औरत के पाप में ढलती है
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
औरत संसार की क़िस्मत है फिर भी तक़दीर की हेटी है
अवतार पयम्बर जन्नती है फिर भी शैतान की बेटी है
ये वो बद-क़िस्मत माँ है जो बेटों की सेज पे लेटी है
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

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साहिर ने समाज में औरतों की स्थिति को व्यक्त किया

7 वर्ष पहले

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