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चीनी आक्रमण के समय छपी वह कविता जो उस समय अधूरी थी, बाद दूसरे कवि ने पूरी की

चीनी आक्रमण के समय छपी वह कविता जो उस समय अधूरी थी, बाद दूसरे कवि ने पूरी की
                
                                                         
                            प्रभात कुमार माथुर के अनुसार "वर्ष 1962 में चीनी आक्रमण के समय तत्कालीन पांचजन्य में छपी थी"। कविता में रचनाकार का नाम गोपाल सिंह नेपाली लिखा था लेकिन कविता अधूरी थी जिसे बाद में प्रभात कुमार माथुर ने पूरा किया। 
                                                                 
                            

शंकर की पुरी, चीन ने सेना को उतारा
चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा
हो जाय पराधीन नहीं गंग की धारा 
गंगा के किनारों ने शिवालय को पुकारा।
चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

अम्बर के तले हिन्द की दीवार हिमालय
सदियों से रहा शांति की मीनार हिमालय
अब मांग रहा हिन्द से तलवार हिमालय
भारत की तरफ चीन ने है पाँव पसारा।
चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

हम भाई समझते जिसे दुनिया से उलझ के
वह घेर रहा आज हमें बैरी समझ के
चोरी भी करे और करे बात गरज के
बर्फों में पिघलने को चला लाल सितारा।
चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।
 
धरती का मुकुट आज खड़ा डोल रहा है
इतिहास में अध्याय नया खोल रहा है
घायल है, अहिंसा का वज़न तोल रहा है
धोखे से गया छूट भाई-भाई का नारा।
चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

है भूल हमारी, वह छुरी क्यों न निकाले
तिब्बत को अगर चीन के करते न हवाले
पड़ते न हिमालय के शिखर चोर के पाले
समझा न सितारों ने घटाओं का इशारा।
चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।
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6 वर्ष पहले

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