किसी नायक को नायक बनाने में उसके किरदार का जितना असर होता है उससे कहीं ज्यादा असर होता है नगमों का। नगमें जो लबों पर बने रहते हैं, नगमें जो दूसरे कि जुबान में हमारे जिंदगी की कहानी कहते हैं। इन तरानों ने हिंदी सिनेमा में रुहपहले पर्दे के बाहर नायक और नायिकाओं को लोगों के दिलों में जिंदा रखा।
बॉलीवुड के सबसे चॉकलेटी और गलत न कहें तो पहले चॉकलेटी हीरो शशि कपूर पर फिल्माए गए नगमें न केवल उनके दौर में बल्कि आज की पीढ़ी के भी लबों पर भी सजते दिखाई देते हैं। साहित्य के बड़े नामों ने उनक तरानों को शक्ल दी जो शशि कपूर साहब पर फिल्माए गए।
शायरों की कलम से निकले कलाम ने पृथ्वीराज कपूर के घर पैदा हुए बलवीर को बॉलीवुड का 'शशि' बना दिया, जिसने हिंदी सिनेमा को न केवल रोशनी दी, बल्कि शीतलता भी दी। अपने दौर में बलवीर पृथ्वीराज कपूर बॉलीवुड का ऐसा 'शशि' बन चुका था जिसे चमकने के लिए किसी सूरज की रोशनी की जरूरत
नहीं थी।
पद्म भूषण सम्मानित डा. गोपाल दास नीरज के लिखे नगमों को जब शशि साहब पर फिल्माया तो उन्होंने धूम मचा दी। शायद ही कोई होगा जिसने नीरज के लिखे गीत के जरिए शशि कपूर को अपने दिल में जिंदा न रखा हो। कन्यादान फिल्म का गीत -
'लिखे जो खत तुझे, वो तेरी याद में
हजारों रंग के, नजारे बन गए।'
इस नगमें को हर उम्र ने पसंद किया और मोहब्बत भरे नगमों में आज भी इस गीत को नजरअंदाज करना नामुमकिन है।
1971 में आई फिल्म 'शर्मीली' के गीतों ने तो शशि साहब को मोहब्बत का ब्रांड एंबेसडर बना दिया। नीरज के लिखे गीत -
खिलते हैं गुल यहां, खिलके बिखरने को। इसी फिल्म का गीत 'आज मदहोश हुआ जाए रे, मेरा मन, मेरा मन, मेरा मन। टाइटल गीत ओ, मेरी, ओ मेरी, ओ मेरी शर्मीली सबकी जुबान पर ऐसा चढ़ा कि आज भी लोग उसे भुला नहीं पाए।
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