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हिंदी में ही वह ताकत है जो राष्ट्र को जोड़ती है...

हिंदी में ही वह ताकत है जो राष्ट्र को जोड़ती है...
                
                                                         
                            हिंदी के विख्यात कवि भवानी प्रसाद मिश्र ने लिखा है -
                                                                 
                            

जिस तरह हम बोलते हैं
उस तरह तू लिख
और उसके बाद भी
हमसे बड़ा तू दिख।


यहाँ कवि का जोर इस बात पर है कि बोलना और लिखना इन दोनों में समानता होनी चाहिए लेकिन लिखने के बाद उसी लिखे के आधार पर जो कुछ दिखे वह उससे भी बड़ा हो। यह बोलना और लिखना ही भाषा है और दिखना है भाषा की ताकत और वह भाषा जो अपनी होती है उसकी ताकत भी उतनी ही बड़ी होती है।

हिंदी को पूरे भारत की भाषा बनाने के पक्षधर थे गांधी जो गैर-हिंदी भाषी थे लेकिन इसकी पुख्ता पृष्ठभूमि भारतेंदु काल से ही तैयार हो चुकी थी। भारतेंदु का जीवन काल भारत के स्वतंत्रता संग्राम के मध्य का काल है। वे अंग्रेजियत के षड्यंत्र को जान रहे थे इसीलिए लिख रहे थे -

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
और एक अति लाभ यह, या मैं प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहु, भाषा माहि प्रचार।
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6 वर्ष पहले

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