सुकृता पॉल के शब्दों में ‘गुलज़ार साब अपनी नज़्मों में सीधे-सादे शब्दों से चौंका देेने वाली तस्वीरें गढ़ते हैं। कहीं तो पढ़ने वालों को अचानक काग़ज़ पर भारी-भरकम ख़याल दफनाये मिलते हैं और कहीं दिखाई देते हैं कर्ज़ की मिट्टी चबाते हुए किसान जो ख़ुदकुशी कर बैठते हैं। एक के बाद एक जैसी ये नन्ही मुन्नी नज़्में अंदर उतरती हैं जीने की लम्बी और गहरी कहानी आहिस्ते- आहिस्ते उभरने लगती है और फिर कोसों लम्बा सफ़र तय कर डालने का ढाढस मिलता है।’
पेश हैं गुलज़ार साहब की लिखी कुछ चुनिंदा नज़्में
मैं अगर छोड़ न देता, तो मुझे छोड़ दिया होता, उसने
इश्क़ में लाज़मी है, हिज्रो- विसाल मगर
इक अना भी तो है, चुभ जाती है पहलू बदलने में कभी
रात भर पीठ लगाकर भी तो सोया नहीं जाता
बीच आस्मां में था
बात करते- करते ही
चांद इस तरह बुझा
जैसे फूंक से दिया
देखो तुम…
इतनी लम्बी सांस मत लिया करो
थोड़ी देर ज़रा-सा और वहीं रुकतीं तो...
सूरज झांक के देख रहा था खिड़की से
एक किरण झुमके पर आकर बैठी थी,
और रुख़सार को चूमने वाली थी कि
तुम मुंह मोड़कर चल दीं और बेचारी किरण
फ़र्श पर गिरके चूर हुईं
थोड़ी देर, ज़रा सा और वहीं रूकतीं तो...
कैसी ये मोहर लगा दी तूने...
शीशे के पार से चिपका तेरा चेहरा
मैंने चूमा तो मेरे चेहरे पे छाप उतर आयी है उसकी,
जैसे कि मोहर लगा दी तूने...
तेरा चेहरा ही लिये घूमता हूँ, शहर में तबसे
लोग मेरा नहीं, एहवाल तेरा पूछते हैं, मुझ से !!
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गुलज़ार की नज़्में...
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