गुलज़ार के नाम से कौन नावाकिफ़ होगा, उनके लिखे गाने लोगों की ज़ुबां पर चढ़े रहते हैं। पेश हैं गुलज़ार साहब की किताब 'कुछ तो कहिए' से उनकी लिखी बेहतरीन ग़ज़ल
दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई
आईना देख के तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई
पक गया है शज़र पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई
फिर नज़र में लहू के छींटे हैं
तुम को शायद मुग़ालता है कोई
देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई
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हवा गुज़र गयी पत्ते थे कुछ हिले भी नहीं
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