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गोपाल दास नीरज: अब रीति सागर का क्या होगा...

गोपाल दास नीरज
                
                                                         
                            प्रेम गीतों के सरताज गोपाल दास नीरज ने मूल रूप से प्रेम के गुलशन को ही अपनी काव्य प्रतिभा से महकाया है। प्रेम का भाव समाज के सभी दंशों को अपने में समोए रहता है। लिहाजा नीरज के गम भरे गीतों में समाज की अन्य कुरीतियों पर भी प्रहार हुआ है। नीरज हमेशा उजाले की बात कहते हैं। वह समाज की कमियों को दूर करने के लिए लालायित रहते हैं। काव्य चर्चा में इस बार हम नीरज की इस कविता के जरिए उनका सामाजिक दर्शन जाहिर कर रहे हैं।
                                                                 
                            

माखन चोरी कर तूने कम तो
कर दिया बोझ ग्वालिन का
लेकिन मेरे श्याम बता
अब रीति सागर का क्या होगा?

    युग-युग चली उमर की मथनी,
    तब झलकी घट में चिकनाई,
    पीर-पीर जब साँस उठी जब
    तब जाकर मटकी भर पाई, आगे पढ़ें

पलक मारते लूट ले गयी...

8 वर्ष पहले

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