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पर्यावरण दिवस पर भवानी बाबू और उनके सतपुड़ा के घने जंगल...

भवानी प्रसाद मिश्र
                
                                                         
                            पर्यावरण दिवस पर भवानी प्रसाद मिश्र की सतपुड़ा के घने जंगल...कविता का जिक्र मन को सुकून के साथ आह्लादित करता है। प्रकृति के कुशल चितेरे कवि भवानी बाबू ने इन जंगलों का सजीव चित्रण किया है। पाठक इसे पढ़कर हरियाली और उसकी खुशहाली का आनंद ले सकते हैं।
                                                                 
                            

सतपुड़ा के घने जंगल।
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

झाड ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मीचे,
घास चुप है, कास चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है।
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल।
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पंक-दल मे पले पत्ते...

8 वर्ष पहले

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