फिरते थे दश्त दश्त दिवाने किधर गए
वे आशिक़ी के हाए ज़माने किधर गए
- अज्ञात
दश्त गुलज़ार हुआ जाता है
क्या यहाँ अहल-ए-वफ़ा बैठे थे
- सफ़िया शमीम
दश्त की ख़ाक भी छानी है
घर सी कहाँ वीरानी है
- विकास शर्मा राज़
कुछ दिनों दश्त भी आबाद हुआ चाहता है
कुछ दिनों के लिए अब शहर को वीरानी दे
- नदीम अहमद
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