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 चंद्रकांत देवताले: कतरा-कतरा अनुभवों को कविताओं में पिरोना कोई इनसे सीखे

चंद्रकांत देवताले
                
                                                         
                            महिलाओं और बच्चों को रूपक मानकर समाज के सुख दुख को अपनी कविताओं में पिरोने वाले यशस्वी कवि चंद्रकांत देवताले ने मूल रूप से हिंदी कविता में बदलाव के पक्षधर रहे हैं। जीवन छोटी-छोटी वस्तुओं का संग्रह है। कविता भी कतरा-कतरा अनुभवों की एक लंबी सीरीज होती है। देवताले ने ऐसी ही कविताओं की रचना की। सरल शब्द, आस पास का सुख दुख उनका मूल विषय रहा है। तभी तो लंबे समय तक उनकी कविताएं याददाश्त में बनी रहती हैं। उनकी कविताओं का समग्र मूल्यांकन एक प्रकार से दर्शन मीमांसा हो सकती है। बेटी के विदा का दृश्य हो या प्रेमी हृदय की भावुकता हो सभी का सटीक वर्णन करते हैं। रिश्तों में पिता-माता, बाप-बेटे, दुनियादारी, वजूद और सामाजिक मूल्यों का बखूबी ध्यान देवताले ने अपनी कविताओं में दिया है।  
                                                                 
                            

मां जब खाना परोसती थी
 
वे दिन बहुत दूर हो गए हैं
जब मां के बिना परसे पेट भरता ही नहीं था
वे दिन अथाह कुए में छूट कर गिरी
पीतल की चमकदार बाल्टी की तरह
अभी भी दबे हैं शायद कहीं गहरे
फिर वो दिन आए जब माँ की मौजूदगी में
कौर निगलना तक दुश्वार होने लगा था
जबकि वह अपने सबसे छोटे और बेकार बेटे के लिए
घी की कटोरी लेना कभी नहीं भूलती थी
उसने कभी नहीं पूछा कि मैं दिनभर कहाँ भटकता रहता था
और अपने पान-तम्बाकू के पैसे कहाँ से जुटाता था
अकसर परोसते वक्त वह अधिक सदय होकर
मुझसे बार-बार पूछती होती
और थाली में झुकी गरदन के साथ
मैं रोटी के टुकड़े चबाने की अपनी ही आवाज़ सुनता रहता
वह मेरी भूख और प्यास को रत्ती-रत्ती पहचानती थी
और मेरे अकसर अधपेट खाए उठने पर
बाद में जूठे बरतन अबेरते
चौके में अकेले बड़बड़ाती रहती थी
बरामदे में छिपकर मेरे कान उसके हर शब्द को लपक लेते थे
और आखिर में उसका भगवान के लिए बड़बड़ाना
सबसे खौफनाक सिद्ध होता और तब मैं दरवाज़ा खोल
देर रात के लिए सड़क के एकान्त और
अंधेरे को समर्पित हो जाता
अब ये दिन भी उसी कुँए में लोहे की वज़नी
बाल्टी की तरह पड़े होंगे
अपने बीवी-बच्चों के साथ खाते हुए
अब खाने की वैसी राहत और बेचैनी
दोनों ही ग़ायब हो गई है
अब सब अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी से खाते हैं
और दूसरे के खाने के बारे में एकदम निश्चिन्त रहते हैं
फिर भी कभी-कभार मेथी की भाजी या बेसन होने पर
मेरी भूख और प्यास को रत्ती-रत्ती टोहती उसकी दृष्टि
और आवाज़ तैरने लगती है
और फिर मैं पानी की मदद से खाना गटक कर
कुछ देर के लिए उसी कुँए में डूबी उन्हीं बाल्टियों को
ढूँढता रहता हूँ।
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प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता

8 वर्ष पहले

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