जहां भी ब्रज भाषा का कहीं भी उल्लेख होगा, वहां जगन्नाथ दास रत्नाकर को प्रमुखता से याद किया जाएगा। जगन्नाथ सिर्फ ब्रज भाषा के कवि ही नहीं थे, वरन वे अनेक भाषाओं (संस्कृत, प्राकृत, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी) के ज्ञाता तथा विद्वान् भी थे। उनकी कवि प्रतिभा जैसी आश्चर्यकारी थी, वैसी ही किसी छंद की व्याख्या करने की क्षमता भी विलक्षण थी। अनेक विद्वानों ने रत्नाकर जी की टीकाओं की प्रशंसा की है।
रत्नाकर जी का ब्रजभाषा पर अद्भुत अधिकार था और उनकी प्रसिद्ध ब्रजभाषा रचनाओं में सुंदर प्रयोगों एवं ठेठ शब्दावली का व्यवहार हुआ है। रत्नाकर जी स्वच्छ कल्पना के कवि हैं।
गोकुल की गैल, गैल गैल ग्वालिन की...
गोकुल की गैल, गैल गैल ग्वालिन की,
गोरस कैं काज लाज-बस कै बहाइबो।
कहै 'रतनाकर' रिझाइबो नवेलिनि को,
गाइबो गवाइबो और नाचिबो नचाइबो॥
कीबो स्रमहार मनुहार कै विविध बिधि,
मोहिनी मृदुल मंजु बाँसुरी बजाइबो।
ऊधो सुख-संपति-समाज ब्रज मंडल के,
भूले न भूलैं, भूलैं हमकौं भुलाइबो॥
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