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धू-धू कर जल रहे हैं जंगल और जल रहा है हमारा भविष्य, इन्हें बचाइए

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हाल ही में अमेज़न के जंगलों में भीषण आग लग गयी। कितनी ही वन-संपदा का नुकसान हमने झेला। जंगलों से उठते धुएं में हमारा भविष्य भी जल रहा है, उसे बचाना होगा। इन जंगलों का, हमारी प्रकृति का संरक्षण करना होगा। वरना परिणाम अति भयंकर व विनाशकारी होंगे। प्रकृति है तो जीवन है इसलिए हमारे कवियों ने इस संदर्भ में कई कविताएं लिखीं हैं।

महाकवि दिनकर तो वृक्षों को विश्व का पहला काव्य मानते हैं

पहली पंक्ति लिखी विधि ने जिस दिन कविता की
उस दिन पहला वृक्ष स्वयं उत्पन्न हो गया
प्रथम काव्य है वृक्ष विश्व के पहले कवि का

(२)
द्रुमों को प्यार करता हूँ।
प्रकृति के पुत्र ये
माँ पर सभी कुछ छोड़ देते हैं,
न अपनी ओर से कुछ भी कभी कहते।
प्रकृति जिस भाँति रखना चाहती
उस भाँति ये रहते।

वन की प्रकृति वामा / केदारनाथ अग्रवाल

हास-हर्ष-हुलास की यह हरी जाया
फूल-फल से, रूप-रस से भरी काया
पात-पात प्रकाश-दीपित प्रकृति वामा
वात-वास-विलास-जीवित सुरति श्यामा
हर रही दव, कर रही संभूत माया
परस अपरस-विरस पर कर रही दाया
जठर जड़ भी चलित चित चैतन्य होते
देखते ही चूमते छवि, धन्य होते
गमक अग का मदन-मद-सा विपुल बहता
पवन पथ का कथन मधु का अतुल कहता
अयन छवि के नयन अन्तर्नयन खुलते
वनज-वन के सदल सम्पुट वदन खुलते 

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वन की प्रकृति वामा / केदारनाथ अग्रवाल

7 वर्ष पहले

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