शनासाई
रात के हाथ पे जलती हुई इक शम-ए-वफ़ा
अपना हक़ मांगती है
दूर ख़्वाबों के जज़ीरे (टापू) में
किसी रौज़न (रौशमदान) से
सुबह की एक किरण झांकती है
वो किरण दरपए-आज़ार (दुख देने को आमादा) हुई जाती है
वो किरण फिर मेरी ग़मख़्वार (हमदर्द) हुई जाती है
आओ किरणों को अंधेरों का कफ़न पहनाएं
इक चमकता हुआ सूरज सर-ए-मक़तल (वधस्थल के पास) लाएं
तुम मेरे पास रहो
और यही बात कहो
आज भी हर्फ़-ए-वफ़ा बायस-ए-रुसवाई (रुसवाई का कारण) है
अपने क़ातिल से मेरी ख़ूब शनासाई (जान पहचान) है
ख़ूब हँस लो मेरी आवारा-मिज़ाजी पर तुम
मैं ने बरसों यूँ ही खाए हैं मोहब्बत के फ़रेब
अब न एहसास-ए-तक़द्दुस न रिवायत की फ़िक्र
अब उजालों में खाऊँगी मैं ज़ुल्मत के फ़रेब
ख़ूब हँस लो की मेरे हाल पे सब हँसते हैं
मेरी आँखों से किसी ने भी न आँसू पोंछे
मुझ को हमदर्द निगाहों की ज़रूरत भी नहीं
और शोलों को बढ़ाते हैं हवा के झोंके
ख़ूब हँस लो की तकल्लुफ़ से बहुत दूर हूँ मैं
मैं ने मस्नूई तबस्सुम का भी देखा अंजाम
मुझ से क्यूँ दूर रहो आओ मैं आवारा हूँ
अपने हाथों से पिलाओ तो मय-ए-तल्ख़ का जाम
ख़ूब हँस लो की यही वक़्त गुज़र जाएगा
कल न वारफ़्तगी-ए-शौक़ से देखेगा कोई
इतनी मासूम लताफ़त से ने खेलेगा कोई
ख़ूब हँस लो की यही लम्हे ग़नीमत हैं अभी
मेरी ही तरह तुम भी तो हो आवारा-मिज़ाज
कितनी बाँहों ने तुम्हें शौक़ से जकड़ा होगा
कितने जलते हुए होंटो ने लिया होगा ख़िराज
ख़ूब हँस लो तुम्हें बीते हुए लम्हों की क़सम
मेरी बहकी हुई बातों का बुरा मत मानो
मेरे एहसास को तहज़ीब कुचल देती है
तुम भी तहज़ीब के मलबूस उतारो फेंको
ख़ूब हँस लो की मेरे लम्हे गुरेज़ाँ हैं अब
मेरी रग रग में अभी मस्ती-ए-सहबा भर दो
मैं भी तहज़ीब से बेज़ार हूँ तुम भी बेज़ार
और इस जिस्म-ए-बरहना को बरहना कर लो
घंटियाँ गूँज उठीं गूँज उठीं
गैस बेकार जलाते हो बुझा दो बर्नर
अपनी चीज़ों को उठा कर रक्खो
जाओ घर जाओ लगा दो ये किवाड़
एक नीली सी हसीं रंग की कॉपी लेकर
मैं यहाँ घर को चला आता हूँ
एक सिगरेट को सुलगाता हूँ
वो मेरी आस में बैठी होगी
वो मेरी राह भी तकती होगी
क्यूँ अभी तक नहीं आए आख़िर
सोचते सोचते थक जाएगी घबराएगी
और जब दूर से देखेगी तो खिल जाएगी
उस के जज़्बात छलक उट्ठेंगे
उस का सीना भी धड़क उट्ठेगा
उस की बाँहों में नया ख़ून सिमट आएगा
उस के माथे पे नई सुब्ह उभरती होगी
उस के होंटो पे नए गीत लरज़ते होंगे
उस की आँखों में नया हुस्न निखर आएगा
एक तर्ग़ीब नज़र आएगी
उस के होंटों के सभी गीत चुरा ही लूँगा
ओह क्या सोच रहा हूँ मुझे कुछ याद नहीं
मैं तसव्वुर में घरोंदे तो बना लेता हूँ
अपनी तन्हाई को पर्दों में छुपा लेता हूँ
सिलसिले ख़्वाब के गुमनाम जज़ीरों की तरह
सीना आब पे हैं रक़्स कुनाँ
कौन समझे कि ये अँदेशा-ए-फ़र्दा की फ़ुसूँ-कारी है
माह ओ ख़ुर्शीद ने फेंके हैं कई जाल इधर
तीरगी गेसू-ए-शब तार की ज़ंजीर लिए
मेरे ख़्वाबों को जकड़ने के लिए आई है
ये तिलिस्म-ए-सहर-ओ-शाम भला क्या जाने
कितने दिल ख़ून हैं अंगुश्त हिनाई के लिए
कितने दिल बुझ गए जब रू-ऐ-निगाराँ में चमक आई है
ख़्वाब है क़ैद-ए-मकाँ क़ैद-ए-जम़ाँ से आगे
किस को मिल सकता है उड़ते हुए लम्हों का सुराग़
कितनी सदियों की मसाफ़त से उभरता है
ख़त-ए-राह-गुज़र
देख इन रेशमी पर्दों की हदों से बाहर
देख लोहे की सलाख़ों से परे
देख सकड़ों पे ये आवारा मिज़ाजों का हुजूम
देख तहजीब के मारों का हुजूम
अपनी आँखों में छुपाए हुए अरमाल की लाश
काफ़िले आते चले जाते हैं
ज़िंदगी एक ही महवर का सहारा ले कर
नाचते नाचते थक जाती है
नाचते नाचते थक जाती है
तेरे पुर-नूर-शबिस्ताँ में कोई मस्त शबाब
जिस की पाज़ेब की हर लय में हज़ारों लाशें
चाँदनी-रात में बीते हुए रूमानों की
अपनी हर साँस से बाँधे हुए पैमानों की
चीख़ती चीख़ती सो जाती हैं
ये कशाकश ये तसादुम ये तज़ाद
मान लेता हूँ ये फ़ितरत की फ़ुसूँ-कारी है
इन उसूलों ही पे क़ाएम है तमद्दुन का निज़ाम
तू ये कहता है मैं भी तेरी ख़ातिर ऐ दोस्त
मान लेता हूँ ये इंसान की तख़्लीक़ नहीं
कोई माशुक़ है उस पर्दा ज़ंगारी में
तेरा माशूक़ मेरे अहद का इँसाँ तो नहीं
तेरी तम्हीद मेरी नज़्म का उनवाँ तो नहीं
साभार- कविताकोश
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आवारा...
8 वर्ष पहले
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