अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- 'आगत' जिसका अर्थ है- आने वाला समय, घटित और प्राप्त। प्रस्तुत है हिंदी के सुप्रसिद्ध गीतकार बालस्वरूप राही की रचना- गत और आगत।
जाने वाले का दर्द नहीं मिटता पर
आने वाले का चाव बहुत होता है
चलते चलते जीवन के दोराहे पर
जब कोई मीत बिछुड़ता है आहें भर
लहराता पीड़ा का सागर अंतर में
पर छलक नहीं पाती नयनों की गागर।
लगता जैसे भीतर कुछ टूट गया है
था एकमात्र जो सम्बल छूट गया है
पर पास मोड़ के अगले ही जब सहसा
मिल जाता कोई साथी नया-नया है
स्वागत का भाव निखर आता लोचन में
यद्यपि गहरा उर-घाव बहुत होता है।
जब कोई फूल मुरझा धरती पर झरता
मन बहुत बिलखता, रोता, सिसकी भरता
पर देख नई कलिका खिलती उपवन में
अरमान नया मन में अनजान उभरता।
तुम कह दो शायद यह धोखा है, छल है
पर मानव-मन का एक यही सम्बल है
कुछ अपना-सा लगता हर आने वाला
जो चला गया वह बेगाना है, कल है।
गत के प्रति मन का मोह नहीं मिट पाता
आगत से किन्तु लगाव बहुत होता है।
सौ बार ज़िन्दगी में आता है अवसर
अधरों पर होता हास, नयन में निर्झर
मन के उपवन में संग-संग रहते हैं
उल्लास-भरा मधुमास, अश्रुमय पतझर।
जब तक सांसों का कोष न चुक पाता है
पीड़ा के सम्मुख माथ न झुक पाता है
तुम कितने ही रोदन के बांध लगाओ
गायन का मधुर प्रवाह न रुक पाता है।
मातम के सौ-सौ मौन हरा देने को
सरगम का पहला दांव बहुत होता है।
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6 वर्ष पहले
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