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नज़ीर के शायराने मिज़ाज पर होली का रंग, पढ़िये 3 बेहतरीन कविताएं 

नज़ीर अकबराबादी
                
                                                         
                            उर्दू अदब में एक से एक बेहतरीन शायर हुए हैं, लेकिन नज़ीर अपना अलग स्थान रखते हैं। नज़ीर को सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल के तौर पर देखा जाता है। उन्होंने होली से लेकर लगभग सभी हिंदू-मुस्लिम त्योहारों पर अपनी कलम चलाई। नज़ीर के शायराने मिज़ाज पर होली का पूरा रंग चढ़ता था, उनकी कलम की स्याही होली के रंगों में मिल जाती थी, उन्होंने झूमकर लिखा-   
                                                                 
                            

जब फ़ागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारे होली की
ख़म शीशए जाम छलकते हों तब देख बहारे होली की
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारे होली की॥1॥
 

हो नाच रंगीली परियों का ...

हो नाच रंगीली परियों का बैठे हों गुलरू रंग भरे
कुछ भीगी तानें होली की कुछ नाज़ो अदा के ढंग भरे
दिल भूले देख बहारों को और कानों में आहंग भरे
कुछ तबले खड़के रंग भरे कुछ ऐश के दम मुंहचुग भरे
कुछ घुंघरू ताल झनकते हों तब देख बहारे होली की॥2॥

सामान जहां तक होता है इस इश्रत के मतलूबों का
वह सब सामान मुहैया हो और बाग़ खिला हो खू़बों का
हर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों का
इस ऐश मजे़ के आलम में एक ग़ोल खड़ा महबूबों का
कपड़ों पर रंग छिड़कते हों तब देख बहारे होली की॥3॥
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हो नाच रंगीली परियों का ...

3 वर्ष पहले

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