शराब-बारिश: बेहतरीन यादों के 21 शेर

21 sher on sharab and barish
                
                                                             
                            पीकर भी तबियत में तल्‍ख़ी है गरानी है,
                                                                     
                            
इस दौर के शीशों में सहबा है कि पानी है। 
अज्ञात 

ऐसा मयकश कौन मयख़ाने से रुख़सत हो गया,
हिचकियां ले ले के रोती है सुराही आत तक। 
अज्ञात 

नींद आ रही है उनको, पलकें झपक रही हैं,
लो बंद हो रहा है मेरा शराबख़ाना।
 अज्ञात 

कर्ज की पीते थे मय, लेकिन समझते ‌थे कि हां,
रंग लाएगी हमारी फ़ाकामस्ती एक दिन। 
ग़ालिब 

दिल ‌थामता कि चश्म पर करता तेरी निगाह,
सागर को देखता कि मैं शीशा संभालता। 
हकीम सनाउल्लाह फिराक़

मुझे यह फिक्र, सब की प्यास अपनी प्यास है साक़ी,
तुझे ये जिद की खाली है मेरा पैमाना बरसों से। 
अज्ञात 

काबे में नज़र आए जो सुबह अज़ां देते,
मयख़ानों में रातों को उनका भी गुज़र देखा। 
रियाज़ ख़ैराबादी 

मुस्कराते हुए यूं आए वो मयख़ाने में,
रुक गयी सांस छलकते हुए पैमानों की। 
जोश मलीहाबादी 

आए थे हंसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़'
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए। 
फ़िराक़ गोरखपुरी

अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में
जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में।
दिवाकर राही

ऐ 'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को न मुंह लगा
छुटती नहीं है मुंह से ये काफ़र लगी हुई। 
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है
जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की।
 परवीन शाकिर 

बरसात के आते ही तौबा न रही बाक़ी
बादल जो नज़र आए बदली मेरी नीयत भी। 
हसरत मोहानी  

छुप जाएं कहीं आ कि बहुत तेज़ है बारिश
ये मेरे तिरे जिस्म तो मिट्टी के बने हैं।
 सबा इकराम  

हैरत से तकता है सहरा बारिश के नज़राने को
कितनी दूर से आई है ये रेत से हाथ मिलाने को। 
सऊद उस्मानी 

क्यूं मांग रहे हो किसी बारिश की दुआएं
तुम अपने शिकस्ता दर-ओ-दीवार तो देखो। 
जाज़िब क़ुरैशी  

मैं चुप कराता हूं हर शब उमड़ती बारिश को
मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है। 
गुलज़ार 

मैं वो सहरा जिसे पानी की हवस ले डूबी
तू वो बादल जो कभी टूट के बरसा ही नहीं। 
सुल्तान अख़्तर 

उस ने बारिश में भी खिड़की खोल के देखा नहीं
भीगने वालों को कल क्या क्या परेशानी हुई।
 जमाल एहसानी  

उस को आना था कि वो मुझ को बुलाता था कहीं
रात भर बारिश थी उस का रात भर पैग़ाम था। 
ज़फ़र इक़बाल  

टूट पड़ती थीं घटाएं जिन की आंखें देख कर
वो भरी बरसात में तरसे हैं पानी के लिए। 
सज्जाद बाक़र रिज़वी 
4 years ago

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