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Hindi Kavita: आलोक धन्वा की कविता- सिर्फ़ पानी की रात है

कविता
                
                                                         
                            आदमी तो आदमी 
                                                                 
                            
मैं तो पानी के बारे में भी सोचता था 
कि पानी को भारत में बसना सिखाऊँगा 

सोचता था 
पानी होगा आसान 
पूरब जैसा 
पुआल के टोप जैसा 
मोम की रोशनी जैसा 

गोधूलि में उस पार तक 
मुश्किल से दिखाई देगा 
और एक ऐसे देश में भटकाएगा 
जिसे अभी नक़्शे में आना है 

ऊँचाई पर जाकर फूल रही लतर 
जैसे उठती रही हवा में नामालूम गुंबद तक 
यह मिट्टी के घड़े में भरा रहेगा 
जब भी मुझे प्यास लगेगी 

शरद में हो जाएगा और भी पतला 
साफ़ और धीमा 
किनारे पर उगे पेड़ की छाया में 

सोचता था 
यह सिर्फ़ शरीर के ही काम नहीं आएगा 
जो रात हमने नाव पर जगकर गुज़ारी 
क्या उस रात पानी 
सिर्फ़ शरीर तक आकर लौटता रहा?  आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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