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Subhadra Kumari Chauhan Poetry: हँस-हँस कर यहाँ निराशा, थी अपने खेल दिखाती

कविता
                
                                                         
                            रीती होती जाती थी
                                                                 
                            
जीवन की मधुमय प्याली।
फीकी पड़ती जाती थी
मेरे यौवन की लाली।।

हँस-हँस कर यहाँ निराशा
थी अपने खेल दिखाती।
धुंधली रेखा आशा की
पैरों से मसल मिटाती।।

युग-युग-सी बीत रही थीं
मेरे जीवन की घड़ियाँ।
सुलझाये नहीं सुलझती
उलझे भावों की लड़ियाँ।

जाने इस समय कहाँ से
ये चुपके-चुपके आए।
सब रोम-रोम में मेरे
ये बन कर प्राण समाए। आगे पढ़ें

3 वर्ष पहले

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