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Hindi Kavita: रुचि बहुगुणा उनियाल की 2 चुनिंदा प्रेम कविताएं

कविता
                
                                                         
                            काम्य अनुवाद - 
                                                                 
                            

जब, 
तुम तक अपनी आकुलताएँ नहीं पहुँचा पाती
तो भाषा मेरी इस पीड़ा से सिसक उठती है
मानों किसी खेत की एड़ियों में
सूखे का प्रमाण देती दर्द भरी गहरी बिवाई  हो

यहाँ इस पहाड़ पर , जहाँ मैं रहती हूँ........
मेरी इस अबोली व्यथा से सहम कर
प्रवासी पक्षियों के झुंड अपना प्रवास भूल
मचाते हैं कोलाहल पीड़ासिक्त स्वर में

तुम्हारी राह तकती हूँ घंटों बेध्यानी में
मेरी ऐसी एकांतिक प्रतीक्षाएँ देख, 
दिशाएँ हड़बड़ी में स्वयं हो जाती हैं दिग्भ्रमित! 

नहीं बूझ पाता कोई......
कि ऋतुओं की कोख क्यों बांझ हो गई है
विधाता इसका दोष झेलने के लिए बाध्य हो गया है।

भाषा की हदें क्यों नहीं बढ़ जाती? 
कि तुम तक पहुँचे मेरे मन की पीड़ा के गीत का मर्सिया
पारिजात के फूलों वाला ये मेरा जन्म माह
भूल जाता है शिऊली की मादक गंध
फूल खिलकर यूँ ही झर जाते हैं पूरे अक्तूबर!

अक्तूबर का घाम हल्का गुनगुना सेंक देता है मेरी पीड़ा को
मैं इधर धूप की एक चम्पई फाँक में तुम्हारा अक़्स उकेरती हूँ ।

तुम्हीं बताओ मेरे प्यार........
ये अंतहीन प्रतीक्षा आँसुओं के अम्बुधि में नहाकर भी लजाती क्यों नहीं?

तुम्हें याद करते हुए मेरी आँखें रुलाई का अनुशासन सीख गईं हैं रे.....!! 
मैं जानती हूँ कि किसी बेढ़ंगी...... और अनचाही हिचकी में
मैं भी तुम्हारे स्मृतिकक्ष की सांकल
बजा आती हूँ चुपचाप।

तुम जानते हो? 
मैं ख़ुद को एक प्रेमासिक्त कविता के रूप में अनूदित होते महसूस करना चाहती हूँ
बस
यही अनुवाद काम्य है जो ठुकरा दिया है सृष्टि पिता ने बहुत निर्ममता से।
 

पुकार 

तुम्हें पुकारती हुई मेरी आवाज़ के कंपन से
थरथराती है हवा की देह
वेगवती पहाड़ी नदी के फेनिल स्वच्छ बहाव में भी
ठिठक कर रुक जाती हैं मछलियाँ
इस कातर पुकार का स्वर
छेड़ता है सिम्फनी का एक और अभिनव सुर
धू-धू कर जलती हैं तुमसे मिलने की
कोमल कामनाएँ और मेरी आत्मा से उठती लपटें 
दूर पहाड़ी की चोटी पर रंगती हैं बुरुंश के 
फूलों की सुकोमल पंखुड़ियां

बिछड़ जाने की पीड़ा से चोटिल 
और तुम्हारे स्वर की छुअन याद करती आत्मा
जैसे एक पहाड़ी शहर हो
जिसकी हर गली के मोड़ पर
तुम्हारा इंतज़ार करती ठिठुरती स्मृतियाँ उकड़ूं बैठी हैं
कहीं दूर पहाड़ी की धार पर
उतरती नवोढ़ा वधू-सी सांझ के आँचल में
तुम्हें लगाई पुकार
बूटों की तरह टांकती है तारों की लड़ी
गहराती रात की कालिमा में ऊँगलियां डुबोकर
प्रतीक्षा में थकी आँखों को सुरमा लगाती हूँ

सुनो प्यार मेरे......
बस ! एक बार तुम पुकारना
शरीर के शिथिल होने से पहले
मुझे अपने दिये नाम से
इन सब जंजालों से दूर
मृत्यु की ठंडी गोद में सोने के लिए
मेरी आत्मा कात लेगी...
तुम्हारे स्वर से कुनकुना सूत!
2 वर्ष पहले

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