सजल है कितना सवेरा!
गहन तम में जो कथा इसकी न भूला,
अश्रु उस नभ के, चढ़ा शिर फूल फूला,
झूम-झुक-झुक कह रहा 'हर श्वास तेरा'!
राख से अंगार-तारे झर चले हैं,
धूम-बंदी रंग के निर्झर खुले हैं,
खोलता है पंख रूपों में अँधेरा!
कल्पना निज देखकर साकार होते
और उसमें प्राण का संचार होते,
सो गया रख तूलिका दीपक-चितेरा!
अलम पलकों से पता अपना मिटाकर,
मृदुल तिनकों में व्यथा अपनी छिपाकर,
नयन छोड़े स्वप्न ने, खग ने बसेरा!
ले उषा ने किरण-अक्षत हास-रोली,
रात अंकों से पराजय-रेख धो ली,
राग ने फिर साँस का संसार घेरा!
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