लौट रहे हैं पाखी
साँझ गिर रही है
जैसे करुणा ही बाक़ी है संसार में
और थोड़ी उन्मत्तता बाक़ी है
ऐसे में कोई कितना बाँध सकता है अपनी छाया
कितना स्वाँग कर सकता है विस्मृति का
प्रेमी और नागरिक के अज्ञातवास में कोई नहीं आता किवाड़ पीटने
साँझ आती है दबे पाँव
निकट ही बैठ कर कालिमा का निस्पंद राग गुनगुनाती है
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