वे सुखी हों जो मजलूम हैं
अब भी खुशियों से महरूम हैं
सर्द रातें हैं जिनके लिए
जिंदगी से जो महरूम हैं,
उनके कदमों में जन्नत झुके
मुस्करा उट्ठें हर हाल में।
कुछ नया हो नए साल में।
दर्द से अब भी सीझी हुई
यह धरा खूँ से भीगी हुई
विश्वयुद्धों के अभिशाप यह
जाने कब से है ढोती हुई
रंजो-गम के मसाइल न हों
आसमां में मिसाइल न हों
शांति के रथ रहें दौड़ते
युद्ध के ऐसे दुष्काल में
हो नया कुछ नए साल में!
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