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चंद्रकांत देवताले: मैं आकाश में इतने ऊपर कभी नहीं उड़ा कि स्त्री दिखाई ही न दे 

कविता
                
                                                         
                            मैं आकाश में इतने ऊपर कभी नहीं उड़ा 
                                                                 
                            
कि स्त्री दिखाई ही न दे 
इसलिए मैं उन लोगों के बारे मैं कुछ नहीं जानता 
कि वे किस तरह सोचते हैं जो ईश्वर के साथ रहते हैं 
वैसे मेरी आत्मा आकाश में बहुत ऊंचे तक उड़ी है 
पर डोर हमेशा किसी स्त्री के हाथ में रही 
और सब जानते हैं कि स्त्री ज़्यादा ढील नहीं देती 

प्रेम करती हुई औरत के बाद भी अगर कोई दुनिया है 
तो उस वक़्त वह मेरी नहीं है 
उस इलाक़े में मैं साँस तक नहीं ले सकता 
जिसमें औरतों की गंध वर्जित है 
सचमुच मैं भाग जाता चंद्रमा से फूल और कविता से 
नहीं सोचता कभी कोई भी बात ज़ुल्म और ज़्यादती के बारे में 
अगर नहीं होती प्रेम करने वाली औरतें इस पृथ्वी पर  आगे पढ़ें

4 वर्ष पहले

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