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भक्तिकाल के कवि सूरदास के पद

bhaktikaal kavi surdas ke pad
                
                                                         
                            
हरि पालनैं झुलावै
जसोदा हरि पालनैं झुलावै
हलरावै दुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै
मेरे लाल को आउ निंदरिया काहें न आनि सुवावै
तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावै
कबहुं पलक हरि मूंदि लेत हैं कबहुं अधर फरकावैं
सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि करि सैन बतावै
इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि जसुमति मधुरैं गावै
जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ सो नंद भामिनि पावै

इस पद में भक्त-कवि सूरदास ने भगवान बालकृष्ण की शयनावस्था का सुंदर चित्रण किया है। वह कहते हैं कि मैया यशोदा श्रीकृष्ण को पालने में झुला रही हैं। कभी तो वह पालने को हल्का-सा हिला देती हैं, कभी कन्हैया को प्यार करने लगती हैं और कभी दुलार करने लगती हैं। कभी वह गुनगुनाने भी लगती हैं। लेकिन कन्हैया को तब भी नींद नहीं आती है इसलिए यशोदा नींद को उलाहना देती हैं कि अरी निंदिया तू आकर मेरे लाल को सुलाती क्यों नहीं? तू शीघ्रता से क्यों नहीं आती? देख, तुझे कान्हा बुलाता है। जब यशोदा निंदिया को उलाहना देती हैं तब श्रीकृष्ण कभी तो पलकें मूंद लेते हैं और कभी होंठों को फड़काते हैं। (यह सामान्य-सी बात है कि जब बालक उनींदा होता है तब उसके मुखमंडल का भाव प्राय: ऐसा ही होता है जैसा कन्हैया के मुखमंडल पर सोते समय जाग्रत हुआ।) जब कन्हैया ने नयन मूंदे तब यशोदा ने समझा कि अब तो कान्हा सो ही गया है। तभी कुछ गोपियां वहां आई। गोपियों को देखकर यशोदा उन्हें संकेत से शांत रहने को कहती हैं। इसी अंतराल में श्रीकृष्ण पुन: कुनमुनाकर जाग गए। तब यशोदा उन्हें सुलाने के उद्देश्य से पुन: मधुर-मधुर लोरियां गाने लगीं। अंत में सूरदास नंदबाबा की पत्नी यशोदा के भाग्य की सराहना करते हुए कहते हैं कि सचमुच ही यशोदा बड़भागिनी हैं। क्योंकि ऐसा सुख तो देवताओं व ऋषि-मुनियों को भी दुर्लभ है।

मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी

मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी
किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी
तू जो कहति बल की बेनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी
काढ़त गुहत न्हवावत जैहै नागिन-सी भुई लोटी
काचो दूध पियावति पचि पचि देति न माखन रोटी
सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी

रामकली राग में बद्ध यह पद बहुत सरस है। बाल स्वभाववश प्राय: श्रीकृष्ण दूध पीने में आनाकानी किया करते थे। तब एक दिन माता यशोदा ने प्रलोभन दिया कि कान्हा! तू नित्य कच्चा दूध पिया कर, इससे तेरी चोटी दाऊ (बलराम) जैसी हो जाएगी। मैया के कहने पर कान्हा दूध पीने लगे। अधिक समय बीतने पर एक दिन कन्हैया बोले, "अरी मैया! मेरी यह चोटी कब बढ़ेगी? दूध पीते हुए मुझे कितना समय हो गया। लेकिन अब तक भी यह वैसी ही छोटी है। तू तो कहती थी कि दूध पीने से मेरी यह चोटी दाऊ की चोटी जैसी हो जाएगी। इसलिए तू मुझे नित्य नहलाकर बालों को कंघी से संवारती है, चोटी गूंथती है, जिससे चोटी बढ़कर नागिन जैसी लंबी हो जाए। कच्चा दूध भी इसलिए पिलाती है। इस चोटी के ही कारण तू मुझे माखन व रोटी भी नहीं देती।" इतना कहकर श्रीकृष्ण रूठ जाते हैं। सूरदास कहते हैं कि तीनों लोकों में श्रीकृष्ण-बलराम की जोड़ी मन को सुख पहुंचाने वाली है।

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मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी

4 वर्ष पहले

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