रुको, आँचल में तुम्हारे
यह समीरन बाँध दूँ, यह टूटता प्रन बाँध दूँ।
एक जो इन उँगलियों में
कहीं उलझा रह गया है
फूल-सा वह काँपता क्षण बाँध दूँ।
फेन-सा इस तीर पर
हमको लहर बिखरा गई है।
हवाओं में गूँजता है मन्त्र-सा कुछ
साँझ हल्दी की तरह
तन-बदन पर छितरा गई है।
पर रुको तो -
पीत पल्ले में तुम्हारे
फ़सल पकती बाँध दूँ।
यह उठा फागुन बाँध दूँ।
’प्यार’ - यह आवाज़
पेड़-घाटियों में खो गई है।
हाथ पर, मन पर, अधर पर, पुकारों पर,
एक गहरी पर्त
झरती पत्तियों की सो गई है
रहो तो,
रुँधे गीतों में तुम्हारे
लपट हिलती बाँध दूँ।
यह डूबता दिन बाँध दूँ।
धूप तकिये पर पिघलकर
शब्द कोई लिख गई है,
एक तिनका, एक पत्ती, एक गाना -
साँझ मेरे झरोखे की
तीलियों पर रख गई है।
पर सुनो तो -
खुले जूड़े में तुम्हारे
बौर पहला बाँध दूँ।
हाँ, यह निमन्त्रण बाँध दूँ।
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