आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Hindi Kavita: ज्ञानेन्द्रपति की कविता 'कर्म का संगीत'

best hindi poetry gyanendrapati hindi kavita karm ka sangeet
                
                                                         
                            

कपड़े पछींटता हुआ आदमी
अपने अनजाने संगीतकार बन जाता है
संगीत में मस्त हो जाता है
कर्म का संगीत धीरे-धीरे बन जाता है संगीत का क्रम

धुल जाता है कपड़े का देहाकार दुख
मन तक निखर जाता है
तब कभी मद्धिम आवाज़ में कहता है कपड़ा -
बहुत हुआ
छोड़ो भी मुझे
तुम्हें कोई काम करना है या नहीं पता नहीं
मेरे आगे उज्ज्वल भविष्य है
पसीने की महक वाला

2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर