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विजय जोशी 'शीतांशु' की लघुकथा: जब नदी से कुँए दोस्ती की....

विजय जोशी 'शीतांशु' की लघुकथा: जब नदी से कुँए दोस्ती की....
                
                                                         
                            नदी के पास एक कुँआ था। जिस  कुँए से उसने दोस्ती कर ली। वर्षा ऋतु में तो दोनों की खूब निभी। दोनों के पास पर्याप्त रूप में जल-निधि थी। धीरे धीरे वर्षा ने अपना साम्राज्य समेटना आरम्भ कर, शरद-शिशिर को प्रकृति का दायित्व संभालने को दे दिया। प्रकृति तो खुशनुमा थी। लेकिन नदी का दायरा सिकुड़ने लगा था। फिर भी नदी की दोस्ती, कुँए से बरकरार रही। दोनों अपने अपने जल की उपस्थिति पर एक दूसरे का सहारा बन जाते। यानि नदी कुँए को जल दे देती। 
                                                                 
                            
 

कभी खेत को सिंचित हरा-भरा कर देते,  तो कभी, गाँव की प्यास बुझा देते थे।  लेकिन दोनों की दोस्ती को ग्रीष्म की नज़र लग गई। नदी का आँचल सूख गया। और कुँए का जलस्तर तलहटी को छूने लगा था। लेकिन नदी ने स्वयं के बाह्य सौन्दर्य को  मिटाकर भी आंतरिक भूगर्भ द्वारा स्नेह अमृत से झिर के रूप में अपने प्रिय मित्र कुँए को जल का सहयोग प्रदान करती रही। वह कुँआ जीवंत रहकर अब स्वयं पर बड़ा अभिमान करने लगा था। उसे घमण्ड आ गया।  विलुप्त नदी हार गई। मैं ही गाँव की जल सेवा कर रहा हूँ।
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5 वर्ष पहले

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