चाहता हूँ उड़ना
पहुँच जाना अंतरिक्ष में
एक ऐसी जगह
जहाँ से दिखती हो पृथ्वी
एक तपते चेहरे की तरह
और पूछना उस से
अब कैसा है दर्द ?
चाहता हूँ दो आत्मीय बाहें उसकी
और लपक कर गले मिलना
उसे थपथपाना कंधों के पास
और कहना—
अपना खयाल रखना !
सोचता हूँ दो गतिशील पैर उस के
लेकिन सधे हुए ऐसे
कि कुछ दूर तक छोड़ आएं
मुझे इस विदाई की घड़ी में
और बेआवाज़ एक ज़ुबान काँपती हुई
जो कहना चाहती हो
कि मेरी खबर लेते रहना !
इच्छा हुई है आज
कि प्रेम करूँ गरमा गरम
इस बीमार लड़्की के चेहरे सी पृथ्वी को
पीते हुए उस के अंतस की मीठी भाप
आगे पढ़ें
कमेंट
कमेंट X