आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

विश्व पृथ्वी दिवस- सुमित्रानंदन पंत की कविता ‘यह धरती कितना देती है’

world earth day 2019 sumitranandan pant hindi kavita
                
                                                         
                            

मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे, 
सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे, 
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी 
और फूल-फलकर मैं मोटा सेठ बनूँगा 
पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा 
बन्ध्या मिट्टी ने न एक भी पैसा उगला 
सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल हो गये 
मैं हताश हो बाट जोहता रहा दिनों तक 
बाल-कल्पना के अपलर पाँवडे बिछाकर 
मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे, 
ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था। 

अर्द्धशती हहराती निकल गयी है तबसे
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने 
ग्रीष्म तपे, वर्षा झूली, शरदें मुसकाई 
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे, खिले वन 
और जब फिर से गाढ़ी, ऊदी लालसा लिये 
गहरे, कजरारे बादल बरसे धरती पर 
मैंने कौतूहल-वश आँगन के कोने की 
गीली तह यों ही उँगली से सहलाकर 
बीज सेम के दबा दिये मिट्टी के नीचे 
भू के अंचल में मणि-माणिक बाँध दिये हो 
मैं फिर भूल गया इस छोटी-सी घटना को
और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन 
किन्तु, एक दिन जब मैं सन्ध्या को आँगन में 
टहल रहा था, तब सहसा, मैंने देखा 
उसे हर्ष-विमूढ़ हो उठा मैं विस्मय से

आगे पढ़ें

7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर