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विश्व पृथ्वी दिवस- सुमित्रानंदन पंत की कविता ‘यह धरती कितना देती है’

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मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे, 
सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे, 
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी 
और फूल-फलकर मैं मोटा सेठ बनूँगा 
पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा 
बन्ध्या मिट्टी ने न एक भी पैसा उगला 
सपने जाने कहाँ मिटे, कब धूल हो गये 
मैं हताश हो बाट जोहता रहा दिनों तक 
बाल-कल्पना के अपलर पाँवडे बिछाकर 
मैं अबोध था, मैंने गलत बीज बोये थे, 
ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था। 

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7 वर्ष पहले

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