हरिवंश राय बच्चन प्रेम और विश्वास के सरताज कवि हैं। उनकी रचनाओं में जीवन संघर्ष की संवेदनाएं सकारात्मक सोच के साथ व्यक्त की गई हैं। प्रेम की मखमली परिभाषा उनके काव्य में देखने को मिलती है। प्रेम के साप्ताहिक उत्सव के बीच हम आपको उनकी एक कविता से रूबरू करा रहे हैं। प्रेम की ऐसी मधुर कसक बच्चन के काव्य में अमूमन देखने को मिलती है।
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर...
मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियां, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?
सांसें घूमघूम फिरफिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं...
तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आने वाले,
पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले,
सांसें घूमघूम फिरफिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं,
मिलने की घड़ियां तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता?
अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपने होश सम्हाले...
उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पांवड़े डाले,
अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपने होश सम्हाले,
तारों की महफिल ने अपनी आंख बिछा दी किस आशा से,
मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता?
रगरग में चेतनता घुलकर, आंसू के कणसी झर जाती...
बैठ कल्पना करता हूं, पगचाप तुम्हारी मग से आती,
रगरग में चेतनता घुलकर, आंसू के कणसी झर जाती,
नमक डलीसा गल अपनापन, सागर में घुल मिल सा जाता,
अपनी बांहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता?
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अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर...
8 वर्ष पहले
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