आग कुछ नहीं बोलती
वह अपने को समेट कर
चुपचाप- माचिस की डिबिया में पड़ी होती है
और प्रतीक्षा रहती है
किसी गृहिणी के हाथों की
जो उसे
गरम-गरम रोटी में बदल देगी
डाल देगी अगरबत्ती की सुगंध में
और अंधेरे के सैलाब में
फूलों के बंदनवार- सी चांग देगी यहां से वहा तक
उसे प्रतीक्षा रहती है
उन खुरदुरे हाथों की
जो उसे दहकाकर शक्ल दे देंगे
हंसिया की, कुदाली की
लोटे की, थाली की
रेलगाड़ी की, जहाज़ की
सन्नाटे में से उटने वाली आवाज़ की
आग कुछ नहीं बोलती
वह सोयी रहती है पेड़ों के भीतर
उसकी लाली- सी
और प्रतीक्षा रहती है वसंत की
जो उसे छूकर
लहका देगा अनंत रंगों के फूलों में
और ज़मीन धीरे-धीरे
फलों और फ़सलों से कसमसाने लगेगी
ज़िंदगी का गीत गुनगुनाने लगेगी
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