9 दिसंबर 1929 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जन्मे रघुवीर सहाय प्रगतिशील काव्यधारा 'नई कविता' के प्रतिनिधि कवि हैं। 30 दिसंबर 1990 को दिल्ली में उन्होंने अंतिम सांस ली। पेश है उनकी चुनिंदा 5 कविताएं।
डर
बढ़िया अँग्रेजी
वह आदमी बोलने लगा
जो अभी तक
मेरी बोली बोल रहा था
मैं डर गया
ठंड से मृत्यु
फिर जाड़ा आया फिर गर्मी आई
फिर आदमियों के पाले से लू से मरने की खबर आई :
न जाड़ा ज्यादा था न लू ज्यादा
तब कैसे मरे आदमी
वे खड़े रहते हैं तब नहीं दिखते,
मर जाते हैं तब लोग जाड़े और लू की मौत बताते हैं
आपकी हँसी
निर्धन जनता का शोषण है
कह कर आप हँसे
लोकतंत्र का अंतिम क्षण है
कह कर आप हँसे
सबके सब हैं भ्रष्टाचारी
कह कर आप हँसे
चारों ओर बड़ी लाचारी
कह कर आप हँसे
कितने आप सुरक्षित होंगे
मैं सोचने लगा
सहसा मुझे अकेला पा कर
फिर से आप हँसे
आनेवाला कल
मुझे याद नहीं रहता है वह क्षण
जब सहसा एक नई ताकत मिल जाती है
कोई एक छोटा-सा सच पकड़ा जाने से
वह क्षण एक और बड़े सच में खो जाता है
मुझे एक अधिक बडे अनुभव की खोज में छोड़ कर
निश्चय ही जो बडे़ अनुभव को पाए बिना सब जानते हैं
खुश हैं
मैं रोज-रोज थकता जाता हूँ और मुझे कोई इच्छा नहीं
अपने को बदलने की कीमत इस थकान को दे कर चुकाने की।
इसे मेरे पास ही रहने दो
याद यह दिलाएगी कि जब मैं बदलता हूँ
एक बदलती हुई हालत का हिस्सा ही होता हूँ
अद्वितीय अपने में किंतु सर्वसामान्य।
हर थका चेहरा तुम गौर से देखना
उसमें वह छिपा कहीं होगा गया कल
और आनेवाला कल भी वहीं कहीं होगा
अरे अब ऐसी कविता लिखो
अरे अब ऐसी कविता लिखो
कि जिसमें छंद घूम कर आय
घुमड़ता जाय देह में दर्द
कहीं पर एक बार ठहराय
कि जिसमें एक प्रतिज्ञा करूँ
वही दो बार शब्द बन जाय
बताऊँ बार-बार वह अर्थ
न भाषा अपने को दोहराय
अरे अब ऐसी कविता लिखो
कि कोई मूड़ नहीं मटकाय
न कोई पुलक-पुलक रह जाय
न कोई बेमतलब अकुलाय
छंद से जोड़ो अपना आप
कि कवि की व्यथा हृदय सह जाय
थाम कर हँसना-रोना आज
उदासी होनी की कह जाय
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