उन खोई रात की बाहों में
जब दर्द ठुमककर चलता है
तो मैं देखूं चुपचाप उसे
वो चीज भला है क्या कैसी...
जब लिये हाथ में लालटेन
वो हर घर में जा बसता है
तो मैं सोचूं इसकी नीयत है
आज खरी या कल जैसी...
वो टक-टक करता लठिया को
झींगुर की बस्ती के पीछे
फिर मरघट वाले झाड़ को लांघे
कुंए पे जा टिकता है...
फिर इधर-उधर को आस-भरी
नजरों से यूं ही देख-देख
वो ऊंघ लगाता कुछ अलसाता
लिये उबासी उठता है...
जब जाऊं पीछे उसके तो
पीछे मुड़-मुड़ के तकता है
फिर पुती राख़ के औघड़ -सा
कुछ मुंह-ही-मुंह में जपता है...
फिर धीमे-धीमे मुझ तक आकर
सधे तने कदमों से वो
यूं बीच निकल के पीछे को
इक धुत्त रीछ सा बढ़ता है...
उसकी भभकी से सराबोर
मैं घर को वापस आता हूं
और ढेर पसीना चिपकाए बस
बैठा सा रह जाता हूं...
फिर चैन नहीं पड़ता मुझको मैं
उठकर फिर से खिड़की को
बस खोल अंधेरे को नजरों से
चीर फाड़कर जाता हूं...
वो दूर कहीं पर्वत की चोटी
पे दिखता एक जुगनू सा
या लैला की हर खोज बंद
करके बैठा इक मजनूं सा...
और वहीं नजर है टकराती
नज़रों में गड़के चीर-चीर
इक पलक देखता है मुझको कि
दम को साधे हो फकीर...
फिर धीमे हुंकारे की तान
उसके मुंह से यूं बहती है
मैं चौंक-चौंककर उठ बैठूं
क्या नींद ये सपना कहती है...
मैं दिन को काटे छान दुपहरिया
शाम खोदता आता हूं
और खोई रात की बाहों में
फिर 'दर्द-खोज' को जाता हूं...
साभार : कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया, पीयूष मिश्रा (राजकमल प्रकाशन)
कमेंट
कमेंट X